कंधमाल हल्दी को GI टैग दिया गया

ओडिशा के कंधमाल जिले में आदिवासी किसानों द्वारा उगाई जाने वाली कंधमाल हल्दी को 1 अप्रैल को भौगोलिक संकेतक (GI) पहचान मिली है. यह हल्दी औषधीय विशेषताओं को लेकर प्रसिद्ध है. इसका रंग सुनहरा पीला होता है और यह अन्य किस्मों से भिन्न है.

दिसंबर, 2018 में कंधमाल अपेक्स स्पाइसेज असोसिएशन फॉर मार्केटिंग ने कंधमाल हल्दी के पंजीकरण के लिए आवेदन दिया था, जिसे वस्तु भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण एवं संरक्षण) अधिनियम की धारा 13 की उप-धारा 1 के तहत मंजूरी दी गई.

पांच किस्मों के कॉफी को GI टैग दिया गया

उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग ने देश में उगाई जाने वाली पांच किस्मों के कॉफी को GI टैग देने की घोषणा हाल ही में की है. इससे पहले ‘मानसूनी मालाबार रोबस्टा काफी’ को GI प्रमाणन दिया गया था. इस बार जिन पांच किस्मों के कॉफी को GI टैग दिया गया है वे हैं:

वायनाड रोबस्टा काफी केरल के वायनाड जिले
कूर्ग अरेबिका काफी कर्नाटक के कोडागू जिले
चिकमगलूर अरेबिका काफी कर्नाटक के चिकमगलूर जिले
अराकू वैली अरेबिका कॉफी आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम जिले और ओडिशा की पहाड़ियां
बाबाबुदन गिरीज अरेबिका कॉफी कर्नाटक के चिकमगलूर जिले

GI टैग क्या है?

GI (Geographical Indication) टैग किसी भी उत्पाद के लिए एक भौगोलिक चिन्ह होता है जो कुछ विशिष्ट उत्पादों (कृषि, प्राक्रतिक, हस्तशिल्प और औधोगिक सामान) को दिया जाता है. यह टैग एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में 10 वर्ष या उससे अधिक समय से उत्पन्न या निर्मित हो रहे उत्पादों को दिया जाता है. GI टैग विश्व व्यापर संगठन (WTO) के द्वारा प्रदान किया जाता है.

भारत में GI टैग

भारत ने GI टैग उत्पादों का (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम को 15 सितम्बर, 2003 को पारित किया था. इस आधार पर भारत के किसी भी क्षेत्र में पाए जाने वाली विशिष्ट वस्तु का कानूनी अधिकार उस राज्य को दे दिया जाता है. भारत में GI टैग सर्वप्रथम वर्ष 2004- 2005 में, दार्जिलिंग चाय को दिया गया.

कई बार ऐसा भी होता है कि एक से अधिक राज्यों में बराबर रूप से पाई जाने वाली फसल या किसी प्राकृतिक वस्तु को उन सभी राज्यों का मिला-जुला GI टैग दिया जाए. यह बासमती चावल के साथ हुआ है. बासमती चावल पर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों का अधिकार है.

भारत में GI टैग्स किसी खास फसल, प्राकृतिक और निर्मित सामानों को दिए जाता है. कई बार ऐसा भी होता है कि एक से अधिक राज्यों में बराबर रूप से पाई जाने वाली फसल या किसी प्राकृतिक वस्तु को उन सभी राज्यों का मिला-जुला GI टैग दिया जाए. यह बासमती चावल के साथ हुआ है. बासमती चावल पर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों का अधिकार है.

GI टैग प्राप्त कर चुके भारत के कुछ उत्पाद

जम्मू और कश्मीर कि पश्मीना, वालनट की लकड़ी पर नक्काशी, सिक्किम कि बड़ी इलायची, मैसूर की रेशम, जयपुर की ब्लू मिट्टी के बर्तन, कन्नौज का परफ्यूम, गोवा कि फेनी, राजस्थान कि थेवा पेंटिंग, महाबलेश्वर स्ट्रोबैरी, जयपुर की ब्लूपोटेरी, बनारसी साड़ी, बिहार की ‘शाही लीची’ और तिरूपति के लड्डू कुछ ऐसे उदाहरण है जिन्हें जीआई टैग मिला हुआ है.

GI टैग के फायदे

  • GI टैग उन उत्पादों को संरक्षण प्रदान करता है, जहाँ घरेलू और अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में प्रीमियम मूल्य निर्धारण का आश्वासन देता है.
  • GI टैग यह भी सुनिश्चित करता है कि अधिकृत उपयोगकर्ताओं निदिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में दर्ज किए गये उत्पादों का नाम अन्य किसी को उपयोग करने कि अनुमति नही देता है.
  • GI उत्पाद किसी भौगोलिक क्षेत्रों में किसानों, बुनकरों शिल्पों और कलाकारों की आय को बढ़ाकर वहां की अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचा सकते हैं.
  • GI टैग मिलने के बाद अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में उस वस्तु की कीमत और उसका महत्व बढ़ जाता है. इस वजह से देश-विदेश से लोग एक खास जगह पर उस विशिष्ट सामान को खरीदने आते हैं.
  • किसी भौगोलिक क्षेत्रों में रहने वाले कारीगरों/ कलाकारों के पास बेहतरीन हुनर, कौशल और पारंपरिक पद्धतियों का ज्ञान होता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहता है. इसे सहेज कर रखने तथा बढ़ावा देने के लिए GI टैग की आवश्यकता होती है.

GI टैग और पेटेंट में अंतर

GI टैग किसी भौगोलिक परिस्थिति के आधार पर दिए जाते हैं, जबकि पेटेंट नई खोज और आविष्कारों को बचाए रखने का जरिया हैं. GI टैग्स और पेटेंट दोनों ही इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (IPR) का हिस्सा हैं, जो पेटेंट्स से मिलते-जुलते ही हैं.