वन ओशन समिट का आयोजन फ्रांस के राष्ट्रपति के नेतृत्व में किया गया

वन ओशन समिट (One Ocean Summit) का आयोजन फ्रांस में 9-11 फरवरी को किया गया था. इसका आयोजन फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के नेतृत्व में किया गया था.  इस सम्मलेन को भारत सहित यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया और कनाडा सहित कई राष्ट्राध्यक्षों ने संबोधित किया था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सम्मलेन को विडियो कांफ्रेंसिंग माध्यम से संबोधित किया था. अपने संबोधन में उन्होंने भारत में सिंगल यूज प्लास्टिक समाप्त करने की प्रतिबद्धता जताई. श्री मोदी ने कहा कि भारत की इंडो-पैसिफिक ओशन इनिशिएटिव में प्रमुख स्तंभ के रूप में समुद्री संसाधन शामिल हैं.

जैव विविधता पर उच्च महत्वाकांक्षा गठबंधन

  • सम्‍मेलन के दौरान, राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे “जैव विविधता पर उच्च महत्वाकांक्षा गठबंधन” (biodiversity beyond national jurisdiction- BBNJ) की घोषणा की गई. BBNJ को “reaty of the High Seas” के रूप में भी जाना जाता है.
  • समुद्र का 95% हिस्सा राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर का है. यह क्षेत्र मानवता को अमूल्य आर्थिक, पारिस्थितिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, वैज्ञानिक और खाद्य-सुरक्षा लाभ प्रदान करता है.
  • यह राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से परे क्षेत्रों की समुद्री जैविक विविधता के संरक्षण और सतत उपयोग पर एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है. यह समुद्र में मानव गतिविधियों को नियंत्रित करने वाला एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय समझौता है.
  • इस गठबंधन में अब तक ऑस्ट्रेलिया, चिली, कनाडा, कोमोरोस, कोलंबिया, भारत, मोनाको, मिस्र, पेरू, मोरक्को, नॉर्वे, कांगो गणराज्य, स्विट्जरलैंड, सिंगापुर, टोगो, यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय संघ और इसके 27 सदस्य देश शामिल हो चुके हैं.
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क्‍वाड विदेश मंत्रियों की चौथी बैठक मेलबर्न में आयोजित की गयी

क्वाड (Quad) देशों के विदेश मंत्रियों की चौथी बैठक 11 फरवरी को ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में आयोजित की गयी थी. बैठक में क्वाड के सभी सदस्य देशों भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमरीका के विदेश मंत्रियों ने हिस्सा लिया था.

विदेश मंत्री डॉक्‍टर सुब्रहमण्यम जयशंकर ने इस बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व किया था. वे ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री मारिस पेन के निमंत्रण पर ऑस्‍ट्रेलिया गये थे. डॉ जयशंकर और ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री ने इस संवाद की सह-अध्यक्षता की थी.

मुख्य बिंदु

  • बैठक में शामिल नेताओं ने सीमा पार आतंकवाद के लिए आतंकवादियों के इस्तेमाल की भी निंदा की. बैठक में, विदेश मंत्री डॉ एस. जयशंकर के साथ-साथ अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के विदेश मंत्रियों ने भी कहा कि अफगानिस्तान का इस्तेमाल किसी भी देश को धमकाने या हमले के लिए नहीं किया जाना चाहिए.
  • चारों देशों के विदेश मंत्रियों ने संयुक्त वक्तव्य में कहा कि क्वाड देश हिन्द-प्रशान्त क्षेत्र को बाधा-रहित और समावेशी बनाने की दिशा में प्रयासरत हैं ताकि इस क्षेत्र में शांति, स्थिरता और आर्थिक खुशहाली सुनिश्चित की जा सके.
  • डॉक्‍टर सुब्रहमण्यम जयशंकर ने हिन्द प्रशान्त क्षेत्र को स्वतंत्र आवाजाही, अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप और दबाव मुक्त बनाये जाने पर बल दिया ताकि इस क्षेत्र में और इससे इतर भी सुरक्षा और खुशहाली को बढ़ावा मिले.

‘क्वाड’ क्या है?

  • ‘क्वाड’ (QUAD) का पूरा नाम Quadrilateral Security Dialogue (QSD) है. यह ‘भारत, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और जापान’ का चतुष्कोणीय गठबंधन है. यह चीन के साथ भू-रणनीतिक चिंताओं के मद्देनजर गठित की गयी है.
  • जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो अबे ने, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया तथा भारत के परामर्श से 2007 में ‘क्वाड’ की शुरुआत की थी. 2008 में ऑस्ट्रेलिया द्वारा इस ग्रुप से बाहर आने के कारण यह संगठन शिथिल पड़ गया था, लेकिन बाद में वह पुन: इस वार्ता में शामिल हो गया.
  • 2017 में, इस अनौपचारिक समूह को पुनर्जीवित किया गया ताकि एशिया में चीन के आक्रामक उदय को संतुलित किया जा सके.
  • क्‍वाड संगठन का उद्देश्‍य इस क्षेत्र में वैध और महत्‍वपूर्ण हित रखने वाले सभी देशों की सुरक्षा और उनके आर्थिक सरोकारों का ध्‍यान रखना है.
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भारत-मध्य एशिया प्रथम शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया

भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन (India-Central Asia Summit) का आयोजन 27 जनवरी को किया गया था. इस सम्मेलन में कज़ाखस्तान, किर्गिज़ गणराज्य, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उजबेकिस्तान के राष्ट्रपतियों ने हिस्सा लिया. यह शीर्ष नेताओं के स्तर पर भारत और मध्य एशियाई देशों के बीच अपनी तरह का पहला जुड़ाव था.

सम्मेलन के मुख्य बिंदु

प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए क्षेत्रीय सुरक्षा और अफगानिस्‍तान के घटनाक्रम पर चर्चा की. श्री मोदी ने कहा कि भारत ने मध्य एशियाई देशों के साथ राजनयिक सम्‍बंधों के महत्‍वपूर्ण तीस वर्ष पूरे कर लिए हैं.

प्रधानमंत्री ने कहा कि शिखर सम्मेलन के तीन प्रमुख उद्देश्य हैं. पहला यह स्पष्ट करना कि भारत और मध्य एशिया का आपसी सहयोग, क्षेत्रीय सुरक्षा और समृद्धि के लिए अनिवार्य. दूसरा उद्देश्य हमारे सहयोग को एक प्रभावी स्ट्रक्चर देना है और तीसरा उद्देश्य हमारे सहयोग के लिए एक महत्वाकांक्षी रोड मैप बनाना है. इसके माध्यम से हम अगले तीन सालों में रीजनल कनेक्टीविटी और को-ऑपरेशन के लिए एक इंटीग्रेटेड अप्रोच अपना सकेंगे.

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स्विट्ज़रलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच की बैठक आयोजित की गयी

स्विट्ज़रलैंड के दावोस में 17 से 21 जनवरी तक विश्व आर्थिक मंच की बैठक आयोजित की गयी थी. इस दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित कई देशों के प्रमुख इस सम्मेलन को संबोधित कर अपने दृष्टिकोण साझा किये. इनमें जापान, ऑस्ट्रेलिया, इस्रायल के प्रधानमंत्री के अलावा चीन और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति भी शामिल थे.

मुख्य बिंदु

  • इस सम्मलेन में उद्योग जगत के शीर्ष नेता, सामाजिक संस्थायें और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी भाग लिया. इस दौरान वे दुनिया के सामने आने वाली महत्वपूर्ण चुनौतियों का समाधान निकालने को लेकर विचार-विमर्श किया.
  • प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 17 जनवरी को वीडियो कांफ्रेंस के माध्‍यम से इस बैठक को संबोधित किया था. उन्होंने जलवायु परिवर्तन और वैक्सीन के मुद्दे पर समानता जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपने विचार साझा किये. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के पुनर्गठन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला.
  • प्रधानमंत्री ने दुनिया को जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से निपटने का सुझाव दिया. उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति अभी भी पर्यावरण के संरक्षण की अपनी सदियों पुरानी परंपराओं पर टिकी हुई है.
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ब्रिक्स देशों के शेरपाओं की पहली बैठक चीन की अध्यक्षता में आयोजित हुई

ब्रिक्स देशों के शेरपाओं (BRICS Sherpas) की पहली बैठक वर्चुअल माध्‍यम से 18 और 19 जनवरी 2022 को आयोजित हुई थी. इस बैठक में भारत के ब्रिक्स शेरपा संजय भट्टाचार्य ने हिस्सा लिया था. ब्रिक्स पांच प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है – ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका.

यह बैठक चीन की अध्यक्षता में हुई जिसमें 2022 के कार्यक्रमों तथा प्राथमिकताओं पर चर्चा हुई. सदस्य देशों ने 2021 में ब्रिक्स की अध्यक्षता के लिए भारत को धन्यवाद दिया है.

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तीसरा भारत-मध्य एशिया संवाद दिल्ली में आयोजित किया गया

तीसरा भारत-मध्य एशिया संवाद 19-20 दिसम्बर को नई दिल्ली में आयोजित किया गया था. इस संवाद में कजाख्स्तान, किरगिज गणराज्य, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान के विदेश मंत्रियों ने हिस्सा लिया था. विदेशमंत्री डॉक्टर एस. जयशंकर ने इनकी अध्यक्षता की थी.

तीसरे वार्षिक संवाद में संबंधों को और मजबूत करने पर विचार-विमर्श हुआ. विशेष रूप से व्यापार, संपर्क तथा विकास सहयोग पर बल दिया गया और परस्पर हित के क्षेत्रीय और वैश्विक मूल्यों पर चर्चा हुई.

भारत का मध्य एशियाई देशों से संबंध

दूसरे संवाद का आयोजन 2020 में भारत की मेजबानी में वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से किया गया था. पिछले कुछ वर्षों से भारत और पांच मध्य एशियाई देशों के बीच संपर्क लगातार बढ़ रहा है. भारत मध्य एशियाई देशों को अपना पड़ोसी मानता है. विदेश मंत्री डॉक्टर जयशंकर ने इस वर्ष कजाख्स्तान, किरगिज गणराज्य, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान की यात्रा की थी. इस वर्ष अक्तूबर में तुर्कमेनिस्तान के विदेशमंत्री से भी उनकी मुलाकात हुई.

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21वां भारत-रूस वार्षिक शिखर बैठक, भारत-रूस ‘टू-प्‍लस-टू’ संवाद

रूस के राष्‍ट्रपति व्‍लादिमीर पुतिन ने 6 दिसम्‍बर को आधिकारिक यात्रा की थी. इस यात्रा के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के साथ 21वें भारत-रूस वार्षिक शिखर बैठक में भाग लिया था. बैठक दिल्ली के हैदराबाद हाउस में आयोजित किया गया था. बैठक में दोनों नेता द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा की और रणनीतिक भागीदारी और मजबूत करने के उपायों पर विचार-विमर्श किया. उनकी यात्रा के दौरान, भारत और रूस ने 28 समझौतों पर हस्ताक्षर किए. उनमें से कुछ अर्ध-गोपनीय थे.

  • पिछली भारत-रूस शिखर बैठक सितम्‍बर 2019 में रूस में हुई थी. 2020 में कोविड महामारी के कारण बैठक नहीं हो सकी थी. नवम्बर 2019 में ब्राजिलिया में ब्रिक्‍स शिखर सम्‍मेलन के अवसर पर मुलाकात के बाद यह दोनों नेताओं की पहली बैठक थी.
  • इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि बीते कुछ दशकों में दुनिया ने बहुत से भूराजनीतिक परिवर्तन देखे हैं, लेकिन भारत और रूस की दोस्ती जस की तस रही है. इस दौरान व्लादिमीर पुतिन ने भी भारत को भरोसेमंद दोस्त करार दिया. पुतिन ने कहा कि हम भारत को एक महान ताकत, मित्र देश और भरोसेमंद साथी के तौर पर देखते हैं.
  • रूसी राष्ट्रपति ने कहा कि फिलहाल दोनों देशों के बीच करीब 38 अरब डॉलर का कारोबार है. इसके अलावा हम सैन्य और तकनीक के क्षेत्र में भी बड़ी साझेदारी रखते हैं. इस मीटिंग में पुतिन ने आतंकवाद के खिलाफ जंग में भी भारत का साथ देने की बात कही.

भारत-रूस ‘टू-प्‍लस-टू’ संवाद, AK-203 राइफलों का निर्माण समझौता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पुतिन की मुलाकात से पहले भारत और रूस के बीच पहला ‘टू-प्‍लस-टू’ संवाद आयोजित किया गया था. इस संवाद में भारत का प्रतिनिधित्‍व रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री डॉक्‍टर एस. जयशंकर ने किया था. इसमें रूस की ओर से विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और रक्षा मंत्री सर्गेई सोइग्‍यू ने भाग लिया.

इस दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रूसी रक्षा मंत्री से मुलाकात के दौरान 5,000 करोड़ रुपये के राइफल निर्माण परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस परियोजना के तहत रूस के सहयोग से 5 लाख से ज्यादा AK-203 राइफलों का निर्माण के अमेठी में किया जाना है. इस दौरान दोनों देशों के बीच अगले 10 साल तक के लिए रक्षा करार भी हुआ.

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भारत G20 ट्रोइका में शामिल हुआ, 2022 में इंडोनेशिया से जी20 का अध्यक्ष पद ग्रहण करेगा

भारत 1 दिसम्बर 2021 को G20 ट्रोइका में शामिल हुआ. वह 2022 में मौजूदा अध्यक्ष इंडोनेशिया से अध्यक्ष पद ग्रहण करेगा. इससे पहले इंडोनेशिया ने इटली से G20 के अध्यक्ष पद ग्रहण किया था. 2023 में पहली बार भारत जी20 देशों की शिखर बैठक की मेजबानी करेगा.

जी20 ट्रोइका में शामिल हुआ

ट्रोइका के तीन देशों में इंडोनेशिया और इटली के साथ भारत भी रहेगा. ये तीनों देश जी20 के मौजूदा, पूर्ववर्ती व भावी अध्यक्ष हैं. जी20 ट्रोइका का मतलब यह है कि हर साल जब एक सदस्य देश अध्यक्ष पद ग्रहण करता है तो वह देश पिछले साल के अध्यक्ष देश और अगले साल के अध्यक्ष देश के साथ समन्वय स्थापित करता है. इस प्रक्रिया को ही ट्रोइका कहा जाता है.

यह जी20 समूह के एजेंडे के साथ सामंजस्य व निरंतरता कायम रखने का काम करता है. भारत 1 दिसंबर 2021 से लेकर 30 नवंबर 2024 तक जी20 ट्रोइका का हिस्सा रहेगा.

इंडोनेशिया ने 1 दिसंबर 2021 को जी20 का अध्यक्ष पद ग्रहण किया था. वह सालभर तक विभिन्न जी20 बैठकें आयोजित करेगा. इसका समापन 30-31 अक्टूबर 2022 को जी20 नेताओं के शिखर सम्मेलन के साथ होगा.

जी20 सदस्य देश

जी20 में अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, जर्मनी, फ्रांस, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, मेक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, तुर्की, यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ शामिल हैं.

जी20 विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों और यूरोपीय संघ को साथ लाता है. इसके सदस्य देशों को विश्व की कुल जीडीपी में 80 फीसदी योगदान है. जबकि विश्व व्यापार में इनका 75 फीसदी और विश्व की कुल आबादी में 60 फीसदी हिस्सेदारी है.

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भारत, चीन और रूस यानी रिक देशों की 18वीं बैठक आयोजित की गयी

भारत, चीन और रूस यानी रिक देशों की 18वीं बैठक 26 नवम्बर को वीडियो कांफ्रेंस के माध्‍यम से आयोजित की गयी थी. बैठक में तीनों देशों के विदेश मंत्रियों ने हिस्सा लिया था. भारत का प्रतिनिधित्व विदेश मंत्री डॉ जयशंकर ने किया था. इससे पहले इन देशों की बैठक ओसाका में जून 2019 में हुई थी.

रिक देशों की 18वीं बैठक: मुख्य बिंदु

  • तीनों देशों के विदेश मंत्रियों ने विश्‍व व्‍यापार संगठन (WTO) की पारदर्शी, समावेशी और भेदभाव मुक्‍त बहुपक्षीय व्‍यापार प्रणाली को सहयोग देने का आश्‍वासन दिया.
  • बैठक के बाद संयुक्‍त वक्‍तव्‍य में नेताओं ने संगठन में आवश्‍यक सुधारों को समर्थन देने पर सहमति व्‍यक्‍त की. इन देशों ने अपीलीय संस्‍था के सदस्‍यों की तेजी से नियुक्ति पर भी जोर दिया.
  • विदेश मंत्रियों ने आतंकवाद के सभी प्रारूपों की कड़े शब्‍दों में निंदा की. उन्‍होंने अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय से संयुक्‍त राष्‍ट्र के नेतृत्‍व में आतंक के विरूद्ध वैश्विक सहयोग को मजबूत करने का आह्वान किया.
  • विदेश मंत्रियों ने रूस, भारत और चीन के बीच त्रिपक्षीय सहयोग बढ़ाने के बारे में विचार रखे. कोविड-19 से लड़ाई में विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन, सरकारों, गैर सरकारी संगठनों, व्‍यापारियों और उद्योगों के सामूहिक प्रयासों के मुद्दे पर भी बैठक में चर्चा की गई.
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13वां एशिया-यूरोप शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया

13वां एशिया-यूरोप शिखर सम्मेलन (ASEM) 25-26 नवम्बर तक वर्चुअल माध्‍यम से आयोजित किया गया था. इस सम्मेलन का विषय – ‘साझा विकास के लिए बहुपक्षवाद को सुदृढ़ बनाना’ था. यह शिखर सम्मेलन एशिया यूरोप बैठक की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित किया गया था. शिखर सम्मेलन में कई राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों ने भाग लिया

सम्‍मेलन की मेजबानी बैठक के अध्यक्ष के रूप में कंबोडिया ने किया था. शिखर सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने किया था.

इस सम्मेलन में बहुपक्षवाद के सुदृढ़ीकरण, कोविड महामारी के बाद सामाजिक-आर्थिक सुधार तथा अन्य क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर मुख्य रूप से चर्चा की गयी.

एशिया-यूरोप बैठक (ASEM): एक दृष्टि

  • एशिया-यूरोप बैठक (Asia–Europe Meeting – ASEM) एक एशियाई-यूरोपीय राजनीतिक संवाद मंच है. यह अपने भागीदारों के बीच संबंधों और सहयोग के कई रूपों को बढ़ाने के लिए काम करता है. पहला एशिया-यूरोप बैठक 1 मार्च, 1996 को बैंकॉक में हुई थी.
  • इस सम्मेलन में एशिया-यूरोप समूह में 51 सदस्य देश और 2 क्षेत्रीय संगठन – यूरोपीय संघ और आसियान शामिल हैं.
  • ASEM शिखर सम्मेलन में अर्थशास्त्र, राजनीति, वित्त, शिक्षा, सामाजिक और संस्कृति के क्षेत्र में पारस्परिक हित के मुद्दों पर एशिया और यूरोप के बीच संवाद आयोजित किया जाता है.
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फार्मास्युटिकल क्षेत्र का पहला वैश्विक नवाचार शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया

फार्मास्युटिकल क्षेत्र का पहला वैश्विक नवाचार शिखर सम्मेलन 18-19 नवम्बर को आयोजित किया गया था. इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्चुअल माध्यम से किया था. इस सम्मेलन में 12 सत्र हुए जिसमें देश-विदेश के 40 से अधिक विशेषज्ञों ने भाग लिया.

सम्मेलन के मुख्य बिंदु

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनाने पर जोर दिया है, जो भारत को दवाओं और चिकित्सा उपकरणों के क्षेत्र में अग्रणी बना सके.
  • उन्होंने कहा कि भारतीय फार्मास्‍युटिकल उद्योग देश के आर्थिक विकास का एक प्रमुख घटक है. भारतीय स्‍वास्‍थ्‍य क्षेत्र में वर्ष 2014 के बाद से 12 बिलियन अमरीकी डॉलर से अधिक का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ है.
  • उन्होंने कहा कि भारतीय स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र द्वारा अर्जित वैश्विक विश्वास की वजह से अब भारत को ‘दुनिया की फार्मेसी’ कहा जाने लगा है.

प्रधानमंत्री ने सिडनी संवाद को सम्‍बोधित किया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सम्मेलन से पहले सिडनी संवाद (Sydney Dialogue) को सम्‍बोधित किया था. अपने संबोधन में उन्होंने सभी लोकतांत्रिक देशों का आह्वान किया कि वे क्रिप्टो-करेंसी के मुद्दे पर संगठित रूप से कार्य करें. उन्होंने कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इसका संचालन गलत हाथों में न जाये अन्यथा युवाओं का भविष्य अंधकारमय हो सकता है.

उन्‍होंने भारत में हो रहे पांच महत्‍वपूर्ण बदलावों को रेखांकित किया. ये बदलाव हैं:

  1. भारत में विश्व के सबसे विस्तृत सार्वजनिक सूचना प्रौदयोगिकी ढांचे का विकास
  2. शासन तथा कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए डिजिटल टेक्‍नोलॉजी का इस्‍तेमाल
  3. स्‍टार्टअप के लिए तेजी से विकसित होता अनुकूल तंत्र
  4. उद्योग और सेवा क्षेत्रों का बडे पैमाने पर डिजिटल रूपांतरण और
  5. टेलीकॉम टेक्‍नोलॉजी में स्‍वेदेशी क्षमता के विकास के लिए निवेश
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26वां अंतरराष्ट्रीय जलवायु शिखर सम्मेलन ग्‍लासगो में आयोजित किया गया

जलवायु परिवर्तन से संबंधित 26वां शिखर सम्‍मेलन (कॉप-26) 31 अक्तूबर से 12 नवंबर तक स्‍कॉटलैंड के ग्‍लासगो में आयोजित किया गया था. इसका आयोजन ब्रिटेन और इटली की सह अध्यक्षता में किया गया था जिसमें 120 से अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने हिस्सा लिया था. सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधत्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया था.

यह सम्‍मेलन धरती के बढ़ते तापमान को नियंत्रित करने के उपायों पर केन्द्रित था. सम्मेलन में पेरिस जलवायु समझौते को पूरा करने से जुड़े दिशा-निर्देशों को अंतिम रूप दिया गया और जलवायु वित्‍तीय संग्रहण तथा बढ़ते वैश्विक तापमान को नियंत्रित करने से जुड़े तय लक्ष्‍यों पर की रूप रेखा तय गयी.

एक सूर्य, एक विश्‍व, एक ग्रिड

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस सम्मेलन के दौरान ‘एक सूर्य, एक विश्‍व, एक ग्रिड’ (One Sun, One World and One Grid) दृष्टिकोण के तहत ‘ग्लोबल ग्रीन ग्रिड इनिशिएटिव’ का शुभारंभ किया था. इसमें सौर ऊर्जा के लिए एक विश्वव्यापी ग्रिड की कल्पना की गयी है.

प्रधानमंत्री ने कहा कि सौर ऊर्जा पूरी तरह से स्वच्छ और सतत है. चुनौती यह है कि यह ऊर्जा केवल दिन के समय उपलब्ध है और मौसम पर निर्भर है. उन्होंने कहा, ‘वन सन, वन वर्ल्ड एंड वन ग्रिड’ इस समस्या का समाधान है और विश्वव्यापी ग्रिड के माध्यम से स्वच्छ ऊर्जा को कहीं भी और कभी भी प्रेषित किया जा सकता है.

संवेदनशील द्वीप देशों के लिए अवसंरचना पहल का शुभारंभ

प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने सम्‍मेलन से अलग संवेदनशील द्वीप देशों के लिए अवसंरचना (IRIS) पहल का शुभारंभ किया. इसका उद्देश्य विकासशील छोटे द्वीप देशों के बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए एक गठबंधन बनाना है. यह गठबंधन जलवायु परिवर्तन के कारण आपदाओं का सामना करने वाले संवेदनशील द्वीप देशों को होने वाले आर्थिक नुकसान को कम करने में मदद करेगा.

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ऐसे छोटे द्वीप देशों (सिड्स) के लिए विशेष आंकडे एक ही जगह उपलब्‍ध कराएगा. इसरो, सिड्स के लिए एक स्‍पेशल डेटा विन्‍डो का निर्माण करेगी. इससे सिड्स को सेटेलाइट्स के माध्‍यम से साइक्‍लोन, कोरल रीफ, मॉनिटरिंग, कोस्‍टलाइन मॉनिटरिंग आदि के बारे में टाइमली जानकारी मिलती रहेगी.

2030 तक वनों की कटाई रोकने का वायदा

विश्‍व के एक सौ से अधिक देशों के नेताओं ने शिखर सम्‍मेलन में पहला बड़ा समझौता किया. इसमें 2030 तक वनों की कटाई रोकने और वनों का दायरा बढ़ाने का वायदा किया गया.

समझौते के लक्ष्‍य को हासिल करने के लिए सार्वजनिक और निजी सहायता से 19 अरब 20 करोड़ डॉलर की प्रतिबद्धता व्‍यक्‍त की गई है. समझौते पर ब्राजील ने भी हस्‍ताक्षर किए हैं, जहां अमेजन के उष्‍णकटिबंधीय वन की कटाई की गई है.

ग्‍लास्गो में अंतर्राष्‍ट्रीय जलवायु सम्‍मेलन के आयोजक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा कि पहले से कहीं ज्‍यादा कुल 110 देशों के नेताओं ने इस ऐतिहासिक प्रतिबद्धता पर सहमति व्‍यक्‍त की है.

भारत वर्ष 2070 तक कार्बन उत्सर्जन मुक्‍त देश बन जाएगा

ग्‍लास्गो जलवायु सम्‍मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि भारत वर्ष 2070 तक कार्बन उत्सर्जन मुक्त देश बन जाएगा. वर्ष 2030 तक अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में से एक अरब टन की कमी की जायेगी. सम्मेलन में श्री मोदी ने राष्ट्रीय वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए पांच मंत्रों का जिक्र किया.

  1. भारत, 2030 तक अपनी नॉन फॉसिल एनर्जी कैपेसिटी को 500 गीगावाट तक पहुंचाएगा.
  2. भारत, 2030 तक अपनी 50 परसेंट एनर्जी रिक्वायरमेंट रिन्‍यूएबल एनर्जी से पूरी करेगा.
  3. भारत अब से लेकर 2030 तक के कुल प्रोजेक्टेड कार्बन एमिशन में एक बिलियन टन की कमी करेगा.
  4. 2030 तक भारत, अपनी अर्थव्यवस्था की कार्बन इंटेन्सिटी को 45 परसेंट से भी कम करेगा और
  5. वर्ष 2070 तक भारत, कार्बन उत्सर्जन मुक्त (नेट जीरो) देश का लक्ष्य हासिल करेगा. ये पंचामृत, क्लाइमेट एक्शन में भारत का एक अभूतपूर्व योगदान होंगे.

पेरिस समझौता इस वर्ष से लागू होने जा रहा है

प्रधानमंत्री ने 2015 में पेरिस में आयोजित कॉप-21 सम्‍मेलन में हिस्‍सा लिया था, जिसमें पेरिस समझौते को अंतिम रूप दिया गया था. कॉप-26 में समझौते से संबद्ध देश पेरिस समझौता क्रियान्‍वयन दिशा-निर्देशों को अंतिम रूप देने का प्रयास करेंगे.

इसमें जलवायु कार्य योजना के लिए धन जुटाने, जलवायु अनुकूलन को बढ़ावा देने, प्रौद्योगिकी विकास और हस्तांतरण तथा धरती के तापमान में वृद्धि को सीमित करने संबंधी पेर‍िस समझौते के लक्ष्‍य प्राप्‍त करने के उपायों पर भी विचार किया जायेगा.

पेरिस समझौते के अंतर्गत देशों द्वारा उत्सर्जन कम करने का स्वयं निर्धारित लक्ष्य है. पेरिस समझौते के अनुसार सभी देशों के लिये राष्ट्रीय प्रतिबद्धता योगदान तय करना और बनाए रखना आवश्यक है.

भारत के, वर्ष 2005 की तुलना में मौजूदा एनडीसी में वर्ष 2030 तक सकल घरेलू उत्पाद के 33 से 35 प्रतिशत तक उत्सर्जन कम करने का लक्ष्य शामिल है. भारत वर्ष 2030 तक विद्युत उत्‍पादन में चालीस प्रतिशत हिस्‍सेदारी गैर-खनिज ईंधन से करने के लिए प्रतिबद्ध है. इससे वातावरण में कार्बन गैस हटाने में मदद मिलेगी.

नेट जीरो कार्बन उत्‍सर्जन

कॉप-26 में नेट जीरो कार्बन उत्‍सर्जन पर चर्चा हुई. नेट जीरो कार्बन उत्‍सर्जन का तात्‍पर्य है कि पृथ्‍वी का तापमान कम करने के लिए मानव निर्मित सभी कार्बन गैस, वातावरण से हटा दी जाए. अमेरिका, ब्रिटेन और जापान ने 2050 तक; यूरोपीय संघ ने 2060 तक; सऊदी अरब, चीन और रूस ने 2070 तक शुद्ध शून्य लक्ष्य हासिल करने का प्रस्ताव रखा है.

जलवायु वित्त या क्‍लाइमेंट फाइनेंस क्या है?

जलवायु वित्‍त या क्‍लाइमेंट फाइनेंस का तात्‍पर्य उन सभी गतिविधियों, कार्यक्रमों या परियोजनाओं के लिए धन का प्रवाह सुनिश्चित करना से है जो जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करती हैं. इनमें जलवायु परिवर्तन के संबंध में तापमान कम करने जैसी दुनियाभर में की जा रही गतिविधियां शामिल हैं. इनके लिए धन विविध प्रकार के स्रोतों, सार्वजनिक और निजी, द्विपक्षीय और बहुपक्षीय तथा वित्‍त के वैकल्पिक स्रोतों से आ सकता है.

2015 के पेरिस समझौते में विकसित देशों ने जलवायु परिवर्तन को रोकने के उद्देश्य से विक‍ासशील देशों के लिए 2020 तक संयुक्त रूप से 100 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता व्‍यक्‍त की थी. इसके बाद यह अवधि बढ़ाकर 2023 कर दी गई थी. भारत निरंतर जलवायु परिवर्तन से निपटने में विकासशील देशों के लिए धनी देशों से ज्यादा योगदान की अपील करता रहा है.

कार्बन ट्रेडिंग क्या है?

कार्बन ट्रेडिंग एक ऐसा सिस्टम है, इसके तहत जो भी उद्योग कार्बन डाइऑकसाइड हवा में छोड़ेगा उसको उतना ही टैक्स भरना पड़ेगा. आसान शब्दों में प्रदूषण करने वालों को इसकी भरपाई भी करनी पड़ेगी. जिसको हम प्ल्यूटेड फेज मैकेनिज्म हम कहते हैं.

कार्बन ट्रेडिंग की व्यवस्था से प्रदूषण कम होता है और उद्योग इंडस्ट्रीज के मालिक सोच-समझकर खर्च करते हैं. साथ ही साथ कार्बन ट्रेडिंग से जो पैसा इकट्ठा होता है, वो क्लाइमेट के योजनाओं के काम आते हैं.

विश्व में कम से 45 देश कार्बन ट्रेडिंग योजना चला रहे हैं. कार्बन ट्रेडिंग भारत के 2070 के नेट जीरो के लक्ष्य को प्राप्त करने में बहुत उपयोगी साबित कर सकता है.

अनुकूलन क्या है?

अनुकूलन, जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभावों के समायोजन की प्रक्रिया है. इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के नुकसान में कमी करना और संभावित अवसरों का उपयोग करना है. अनुकूलन के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के परिणाम से उत्पन्न खतरों को भी कम किया जाता है.

जल स्रोतों का अधिक कुशल उपयोग, भविष्य की जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल इमारतों का निर्माण, प्रतिकूल मौसम और सूखे की मार झेल सकने वाली फसलों का विकास अनुकूलन के कुछ उदाहरण हैं. अनुकूलन कार्यक्रम के माध्यम से हरित रोज़गार के अवसर, गरीबों और वंचितों के लिए खतरे में कमी और भावी पीढ़ियों के लिए पर्यावरण सुरक्षा जैसे परिणाम हासिल किए जा सकते हैं.

COP27 की मेजबानी मिस्र करेगा

ग्लासगो में COP26 सम्मेलन के दौरान, यह निर्णय लिया गया कि मिस्र 2022 में COP27 संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन की मेजबानी करेगा. मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी ने सितंबर में अफ्रीकी महाद्वीप की ओर से COP27 की मेजबानी करने में मिस्र की रुचि दिखाने के बाद यह निर्णय लिया था. इसके अलावा, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को वर्ष 2023 में COP28 अंतर्राष्ट्रीय जलवायु सम्मेलन की मेजबानी के लिए चुना गया था.

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