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मद्रास उच्च न्यायालय ने राजमार्गों पर तय गति सीमा को रद्द किया

मद्रास उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार की राजमार्गों और एक्सप्रेसवे पर तय की गई गति सीमा को रद्द कर दिया है. न्यायालय ने 2018 की उस अधिसूचना को रद्द किया है जिसमें एक्सप्रेसवे पर 120 किमी/घंटा, राष्ट्रीय राजमार्गों पर 100 किमी/घंटा, जबकि एम 1 श्रेणी के वाहनों के लिए गति सीमा 60 किमी/घंटा निर्धारित की गई थी. हाई कोर्ट का यह आदेश एक अपील पर दिया है.

न्यायालय ने कहा कि, अधिक गति मृत्यु का मुख्य कारण है और अधिकांश दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार है. इस तथ्य को जानने के बावजूद, सरकार ने वाणिज्यिक कारणों सहित विभिन्न कारणों से गति सीमा बढ़ा दी है. इससे अधिक मौतें हो रही हैं. इसका हवाला देते हुए  यह अधिसूचना रद्द की गई है.

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सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपाल के क्षमादान की शक्ति पर व्याख्या की

सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में राज्यपाल के क्षमादान की शक्ति पर व्याख्या की थी. न्यायालय ने माना कि, राज्यपाल की क्षमा करने की शक्ति, ‘दंड प्रक्रिया संहिता’ (CrPC) की धारा 433A के तहत दिए गए प्रावधान की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है.

मुख्य बिंदु

  • इससे पहले जनवरी 2021 में दया याचिका के एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि राज्यपाल राज्य मंत्रिपरिषद की सिफारिश को अस्वीकार नहीं कर सकता है, हालाँकि निर्णय लेने के लिये कोई समयसीमा निर्धारित नहीं की गई है.
  • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल 14 वर्ष की जेल होने से पूर्व भी कैदियों को क्षमादान दे सकता है.
  • CrPC की धारा 433A किसी भी स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 72 या 161 के तहत राष्ट्रपति/राज्यपाल को क्षमादान देने की संवैधानिक शक्ति को प्रभावित नहीं कर सकती है.
  • न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 161 के तहत एक कैदी को क्षमा करने की राज्यपाल की संप्रभु शक्ति वास्तव में राज्य सरकार द्वारा प्रयोग की जाती है.
  • लघुकरण और रिहाई की कार्रवाई इस प्रकार एक सरकारी निर्णय के अनुसार हो सकती है और राज्यपाल की मंज़ूरी के बिना भी आदेश जारी किया जा सकता है.
  • CrPC की धारा 432 सरकार को सज़ा माफ करने का अधिकार देती है. राज्य सरकार इस या संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत छूट देने की नीति बना सकती है.
  • यदि कोई कैदी 14 वर्ष से अधिक समय तक कारावास में रह चुका है, तो राज्य सरकार समय से पहले रिहाई का आदेश पारित करने में सक्षम है.
  • भारत में राष्ट्रपति और राज्यपाल की क्षमादान शक्ति:
  • संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को अपराध के लिये दोषी ठहराए गए किसी भी व्यक्ति की सज़ा को माफ करने, राहत देने, छूट देने या निलंबित करने, हटाने या कम करने की शक्ति है, जहाँ दंड मौत की सज़ा के रूप में है.
  • अनुच्छेद 161 के तहत राज्य के राज्यपाल के पास किसी ऐसे मामले से संबंधित किसी भी कानून के खिलाफ किसी भी अपराध के लिये दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सज़ा को माफ करने, राहत देने, राहत या छूट देने या निलंबित करने, हटाने या कम करने की शक्ति है.
  • अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का दायरा अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की क्षमादान शक्ति से अधिक व्यापक है. राष्ट्रपति उन सभी मामलों में क्षमादान दे सकता है जहाँ दी गई सजा मौत की सजा है लेकिन राज्यपाल की क्षमादान शक्ति मौत की सजा के मामलों तक विस्तारित नहीं होती है.
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उच्चतम न्यायालय ने नए कृषि कानूनों पर रोक लगायी, विशेषज्ञों की एक समिति का गठन

उच्चतम न्यायालय ने तीनों नए कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगा दी है. मुख्य न्यायाधीश एसए बोबड़े की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह फैसला 12 जनवरी को सुनाया. उच्चतम न्यायालय की यह पीठ संसद द्वारा पारित तीन नए कृषि कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी.

विशेषज्ञों की एक समिति का गठन

उच्चतम न्यायालय की यह पीठ ने इन कानूनों के गुण और दोषों पर सुझाव देने के लिए विशेषज्ञों की एक समिति का भी गठन किया है. गठित की गई समिति कोई आदेश पारित नहीं करेगी और न ही किसी को दंड देगी, बल्कि वह अपनी रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय को प्रस्तुत करेगी. यह समिति न्यायिक प्रक्रिया का एक हिस्सा होगी. जब तक इस समिति की रिपोर्ट नहीं आती है तब तक कृषि कानूनों के अमल पर रोक रहेगी. विशेषज्ञों समिति में चार सदस्य होंगे. ये सदस्य हैं:

  1. भूपिंदर सिंह मान (अध्यक्ष भारतीय किसान यूनियन)
  2. डॉ प्रमोद कुमार जोशी (अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान)
  3. अशोक गुलाटी (कृषि अर्थशास्त्री)
  4. अनिल धनवट (शिवकेरी संगठन, महाराष्ट्र)

तीन कृषि कानूनों का विरोध

उल्लेखनीय है की संसद ने किसानों की आय को बढाने के लिए तीन कृषि कानूनों को पारित किया था. इन कानूनों में मौजूदा विकल्पों को जारी रखते हुए किसानों को अपने उत्पाद बेचने के लिए कई और विकल्प दिए गये हैं. इन्हीं कानूनों के विरोध में मुख्य रूप से पंजाब के किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.

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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के निर्माण की अनुमति दी

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर 5 जनवरी को निर्णय सुनाया. जस्टिस एएम खानविल्कर की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने 2-1 के बहुमत से सरकार को इस प्रोजेक्ट के निर्माण की अनुमति दी. इस निर्णय के साथ ही नए संसद भवन के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है.

लुटियंस जोन में सेंट्रल विस्टा परियोजना के निर्माण को चुनौती देने वाली याचिकाओं में पर्यावरण मंजूरी समेत कई मुद्दों पर सुनवाही करते हुए कोर्ट ने यह निर्णय सुनाया. कोर्ट ने अपने निर्णय में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा दी गई सिफारिशों को बरकरार रखा और निर्माण के दौरान पर्यावरण का ध्यान रखने की बात कही.

जस्टिस खानविलकर और जस्टिस दिनेश माहेश्वरी के अलावा पीठ के तीसरे जज जस्टिस संजीव खन्ना ने भी परियोजना को मंजूरी पर सहमति जताई, लेकिन भूमि उपयोग में बदलाव संबंधी फैसले और परियोजना को पर्यावरण मंजूरी दिए जाने पर असहमति जताई.

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट क्या है?

केंद्र सरकार ने दिल्ली के लुटियंस जोन में सेंट्रल विस्टा के निर्माण की घोषणा सितंबर, 2019 में की थी. इस परियोजना पर 20 हजार करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 दिसंबर को नए संसद भवन के निर्माण के लिए आधारशिला रखी थी.

इस परियोजना में संसद की नई त्रिकोणीय इमारत होगी, जिसमें एक साथ 900 से 1200 सांसद बैठ सकेंगे. इसका निर्माण 75वें स्वतंत्रता दिवस पर अगस्त, 2022 तक पूरा किया जाना है. इसमें केंद्रीय सचिवालय का निर्माण वर्ष 2024 तक करने की योजना है.

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सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद-142 का प्रयोग कर पहली बार किसी मंत्री को बर्खास्त किया

सुप्रीम कोर्ट ने 18 मार्च को पूर्वोत्तरीय राज्य मणिपुर के कैबिनेट मंत्री टीएच श्याम कुमार को बर्खास्त कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत हासिल विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए मंत्री के खिलाफ यह कार्रवाई की है. ऐसा पहली बार हुआ है जब इस अनुच्छेद का प्रयोग कर किसी मंत्री को बर्खास्त किया गया हो. कोर्ट ने दल-बदल कानून के तहत विधायक को अयोग्य ठहराते हुए उनके विधानसभा में जाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया.

क्या है मामला?

मणिपुर में 2017 में हुए 60 सीटों पर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के 28 और BJP के 21 सदस्य (विधायक) चुने गये थे. कांग्रेस के 9 विधायक चुनाव के बाद पार्टी छोड़कर BJP में चले गए. श्याम कुमार भी उनमें से एक थे, जिन्हें कैबिनेट मंत्री बना दिया गया था. विधानसभा अध्यक्ष से दल-बदल रोधी कानून के तहत श्यामकुमार को अयोग्य ठहराने की मांग की गई थी. विधानसभा अध्यक्ष की तरफ कोई निर्णय नहीं आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने विशेषाधिकार का प्रयोग किया.

क्या है अनुच्छेद-142?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 212 के अनुसार देश का कोई भी न्यायालय राज्य विधानमंडल की कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं कर सकता, लेकिन अनुच्छेद-142 के तहत सुप्रीम कोर्ट को विशेषाधिकार हासिल है.

अनुच्छेद-142 के अनुसार अगर सुप्रीम कोर्ट को ऐसा लगता है कि किसी अन्य संस्था के जरिए व्यवस्था को बरकरार रखने के लिए किसी तरह का आदेश देने में देरी हो रही है, तो कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत खुद उस मामले में फैसला ले सकता है. सुप्रीम कोर्ट इस अनुच्छेद का इस्तेमाल विशेष परिस्थितियों में ही करता है.

अयोध्या विवाद और भोपाल गैस त्रासदी मामले में अनुच्छेद-142 का प्रयोग

सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद-142 के तहत अयोध्या की विवादित जमीन रामलला विराजमान को सौंपने और मुसलमानों को मस्जिद के लिए 5 एकड़ जमीन अलग से देने का फैसला सुनाया था.

भोपाल गैस त्रासदी मामले में भी अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल किया था. इस मामले में कोर्ट ने यह महसूस किया कि गैस के रिसाव से पीड़ित हजारों लोगों के लिये मौजूदा कानून से अलग निर्णय देना होगा.

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सुप्रीम कोर्ट ने वित्तीय संस्थानों को क्रिप्टोकरेंसी से संबंधित सेवाएं देने की इजाजत दी

सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों को क्रिप्टोकरेंसी से संबंधित सेवाएं देने की इजाजत दे दी है. क्रिप्टोकरेंसी डिजिटल या आभासी मुद्राएं हैं, जिनमें मुद्रा इकाइयों के बनाने और फंड के लेन-देन का सत्यापन करने के लिए एन्क्रिप्शन तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है और यह व्यवस्था केंद्रीय बैंक से स्वतंत्र रहकर काम करती है.

कोर्ट ने RBI के सर्कुलर को रद्द किया

न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने 4 मार्च को सुनाये अपने फैसले में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 2018 के सर्कुलर को रद्द करते हुए यह आदेश दिया. RBI इस सर्कुलर के अनुसार देश में आभासी मुद्राओं से संबंधित कोई भी सेवा प्रदान करने पर रोक थी.

क्या है क्रिप्टोकरेंसी?

क्रिप्टोकरेंसी एक प्रकार की आभासी (वर्चुअल) मुद्रा है. आभासी से मतलब है कि अन्य मुद्रा की तरह क्रिप्टोकरेंसी का कोई भौतिक स्वरुप नहीं है. क्रिप्टोकरेंसी को आप ना तो देख सकते हैं और न ही छू सकते हैं. यह एक डिजिटल करेंसी है. बिटकॉइन, इथीरियम, रिप्पल, लाइटकॉइन इत्यादि कुछ प्रमुख क्रिप्टोकरेंसी हैं.

जानिए क्या है क्रिप्टोकरेंसी…»

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उच्‍चतम न्‍यायालय ने महिला अधिकारियों को सेना में स्‍थाई कमीशन दिया जाने का निर्देश दिया है


उच्‍चतम न्‍यायालय ने महिला अधिकारियों को भी पुरुष अधिकारियों की तरह सेना में स्‍थाई कमीशन दिया जाने का निर्देश दिया है. 17 फरवरी को सुनाये अपने फैसले में न्यायलय ने केन्‍द्र सरकार को तीन महीने के भीतर उन सभी महिला अधिकारियों को स्‍थाई कमीशन दिये जाने का आदेश दिया जिन्‍होंने इसका विकल्‍प चुना है. न्‍यायालय ने कहा कि महिला अधिकारियों को कमान तैनाती दिये जाने पर भी कोई प्रतिबंध नहीं होगा.

महिलाओं को तैनाती से वंचित रखना समानता के अधिकार के विरूद्ध

न्‍यायमूर्ति डीवाई चन्‍द्रचूड़ की अध्‍यक्षता वाली पीठ ने सरकार के इस तर्क को अस्वीकार कर दिया कि महिलाओं को स्‍थाई कमीशन अथवा कमान तैनाती न दिया जाना मनोवैज्ञानिक सीमाओं और सामाजिक व्‍यवस्‍था के तहत है. अदालत ने कहा कि महिलाओं को इस तरह की तैनाती से वंचित रखना गैर-तार्किक तथा समानता के अधिकार के विरूद्ध है.

दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय के फैसले को सही माना

उच्‍चतम न्‍यायालय ने महिला अधिकारियों को स्‍थार्इ कमीशन की अनुमति के दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय के 2010 के फैसले पर कोई रोक नहीं लगायी है. दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय ने 2010 में शॉर्ट सर्विस कमिशन के तहत सेना में आने वाली महिलाओं को सेवा में 14 साल पूरे करने पर पुरुषों की तरह स्थायी कमिशन देने का आदेश दिया था. इस फैसले के खिलाफ रक्षा मंत्रालय ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी.

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चुनाव लड़ने वाले उम्‍मीदवारों पर आपराधिक मुकदमों का ब्‍यौरा सार्वजानिक करने का निर्देश

उच्‍चतम न्‍यायालय ने राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने वाले उम्‍मीदवारों पर लम्बित आपराधिक मुकदमों का ब्‍यौरा अपनी वेबसाइट पर अपलोड करने का निर्देश दिया है. राजनीति के अपराधीकरण के मुद्दे से जुड़ी अवमानना याचिका की सुनवाही करते हुए न्‍यायालय ने यह निर्देश दिए.

निर्वाचन आयोग को सूचना देने के निर्देश

न्‍यायालय ने राजनीतिक दलों से आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे उम्‍मीदवार को चुनाव में उतारने का फैसला करने के 72 घंटों के अन्‍दर निर्वाचन आयोग को सूचना देने के निर्देश का अनुपालन करने संबंधी रिपोर्ट भी मांगी है.

राजनीति के अपराधीकरण में चिन्‍ताजनक वृद्धि

अपने आदेश में न्‍यायमूर्ति एफ नरीमन की पीठ ने कहा कि ऐसा लगता है कि लोकसभा के पिछले चार चुनावों के दौरान राजनीति के अपराधीकरण में चिन्‍ताजनक स्‍तर तक वृद्धि हुई है.

कारण बतायें कि ऐसे उम्‍मीदवारों का चुनाव क्‍यों किया

न्‍यायालय ने राजनीतिक दलों को यह भी निर्देश दिया कि वे अपनी वेबसाइट पर कारण बतायें कि ऐसे उम्‍मीदवारों का चुनाव क्‍यों किया गया है, जिन के खिलाफ आपराधिक मुकदमे लम्बित हैं. राजनीतिक दलों को फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल मीडिया तथा एक स्‍थानीय भाषा और एक राष्‍ट्रीय अखबार में भी यह ब्‍यौरा प्रकाशित कराने का निर्देश दिया गया है.

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उच्‍चतम न्‍यायालय ने संसद से लोकसभा और विधानसभा अध्यक्षों के अधिकारों की समीक्षा करने को कहा

उच्‍चतम न्‍यायालय ने संसद से सदस्यों को अयोग्य ठहराने के लोकसभा और विधानसभा अध्यक्षों के अधिकारों की समीक्षा करने को कहा है. न्यायालय ने 21 जनवरी को ऐतिहासिक व्‍यवस्‍था देते हुए कहा कि संसद को फिर से सोचना होगा कि क्‍या किसी सदस्‍य को अयोग्‍य ठहराने की याचिकाओं पर फैसले का अधिकार लोकसभा या विधानसभा अध्‍यक्ष को अर्द्धन्‍यायिक प्राधिकारी के रूप में दिया जाना चाहिए.

संसदीय ट्रिब्‍यूनल के लिए संविधान संशोधन पर विचार

न्‍यायालय ने कहा कि सदन का अध्‍यक्ष प्रत्‍यक्ष या परोक्ष रूप से किसी पार्टी विशेष से जुड़ा होता है. किसी सदस्‍य को अयोग्‍य ठहराने का अधिकार लोकसभा या विधानसभा अध्‍यक्ष की बजाए संसदीय ट्रिब्‍यूनल को देने के लिए संविधान संशोधन पर संसद को गम्‍भीरता से विचार करना चाहिए.
न्‍यायालय कांग्रेस नेता केशम मेघचन्‍द्र सिंह द्वारा मणिपुर उच्‍च न्‍यायालय के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया.

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उच्‍चतम न्‍यायालय ने संविधान के अनुच्‍छेद 19 के तहत इंटरनेट सेवा मूल अधिकार माना

उच्‍चतम न्‍यायालय ने कहा है कि कुछ प्रतिबंधों के साथ संविधान के अनुच्‍छेद 19 के तहत इंटरनेट सेवा मूल अधिकार है. न्‍यायालय ने 10 जनवरी को जम्‍मू-कश्‍मीर प्रशासन से कहा कि केन्‍द्र शासित प्रदेश में लगे प्रतिबंध के सभी आदेशों की एक सप्‍ताह के अंदर समीक्षा की जाए. पीठ ने कहा कि अभिव्‍यक्ति की आजादी और असहमति को दबाने के लिए निषेधाज्ञा का अनिश्चितकाल तक इस्‍तेमाल नहीं किया जा सकता.

न्‍यायमूर्ति एनवी रमणा की अध्‍यक्षता वाली तीन न्‍यायाधीशों की पीठ ने प्रशासन को अस्‍पतालों और शिक्षण केन्‍द्रों जैसी आवश्‍यक सेवाएं उपलब्‍ध कराने वाले सभी संस्‍थानों में इंटरनेट सेवाएं बहाल करने का भी निर्देश दिया. पीठ ने कहा कि प्रेस की आजादी मूल्‍यवान और पवित्र अधिकार है. तीन न्‍यायाधीशों की पीठ में न्‍यायमूर्ति बीआर गवई और आर सुभाष रेड्डी शामिल हैं.

पीठ ने उन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान ये निर्देश दिए, जिनमें 5 अगस्‍त को अनुच्‍छेद 370 के प्रावधान निरस्‍त करने के केन्‍द्र के कदम के बाद जम्‍मू-कश्‍मीर में लागू प्रतिबंधों को चुनौती दी गई है. ये याचिकाएं उन याचिकाओं से अलग हैं, जिनमें अनुच्‍छेद 370 को निष्प्रभावी करने की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है और जिनकी सुनवाई पांच न्‍यायाधीशों की संविधान पीठ कर रही है.

क्या है अनुच्छेद 19?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकार की बात करता है. इस अनुच्छेद के मौलिक अधिकार हैं:

  1. अनुच्छेद 19(1)(a): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (freedom of expression)
  2. अनुच्छेद 19(1)(b): बिना हथियार किसी जगह शांतिपूर्वक इकट्ठा होने का अधिकार
  3. अनुच्छेद 19(1)(c): संघ या संगठन बनाने का अधिकार
  4. अनुच्छेद 19(1)(d): भारत में कहीं भी स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार
  5. अनुच्छेद 19(1)(e): भारत के किसी भी हिस्से में रहने और बसने का अधिकार
  6. अनुच्छेद 19(1)(g): कोई भी पेशा अपनाने या व्यापार करने का अधिकार

अनुच्छेद 19 (2): भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 (2) के तहत अनुच्छेद 19 (1) इन अधिकारों को सीमित भी किया गया है. अनुच्छेद 19 (2) में कहा गया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से किसी भी तरह देश की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता को नुकसान नहीं होना चाहिए. इन तीन चीजों के संरक्षण के लिए अगर कोई कानून है या बन रहा है, तो उसमें भी बाधा नहीं आनी चाहिए.

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सुप्रीम कोर्ट ने शबरिमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मामले की सुनवाही बड़ी बेंच को दिया

सुप्रीम कोर्ट ने शबरिमला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश के मामले की सुनवाही के लिए सात जजों की बड़ी बेंच को दे दिया है. यह संवैधानिक बेंच इस मामले के साथ-साथ मस्जिद में मुस्लिम, अज्ञारी में पारसी महिलाओं और दाऊदी बोहरा समुदाय की महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर भी फैसला लेगी.

सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने अपने फैसले पर पुनर्विचार याचिकाओं को 3-2 के बहुमत के आधार पर बड़ी बेंच को भेजा. 3 जजों ने बहुमत से मामले को 7 जजों की संविधान पीठ को रेफर किया है जबकि 2 जजों- जस्टिस नरीमन और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इसके खिलाफ अपना निर्णय दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि महिलाओं के प्रवेश का पिछला फैसला फिलहाल बरकरार रहेगा. CJI रंजन गोगोई ने कहा कि धार्मिक प्रथाओं को सार्वजनिक आदेश, नैतिकता और संविधान के भाग 3 के अन्य प्रावधानों के खिलाफ नहीं होना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने लिंग आधारित भेदभाव माना था
उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2018 को अपने फैसले में शबरिमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु वाली महिलाओं और लड़कियों के प्रवेश पर लगी रोक को लिंग आधारित भेदभाव माना था. कोर्ट ने हिंदू धर्म की सदियों पुरानी इस परंपरा को गैरकानूनी और असंवैधानिक कहा था.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर हिंसक विरोध के बाद 56 पुनर्विचार याचिकाओं सहित करीब 60 याचिकाएं अदालत में दाखिल हुईं जिन पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सुनवाई की.

सुप्रीम कोर्ट ने रफाल लड़ाकू विमानों की खरीद के मामले में जांच की याचिका को नामंजूर किया

सुप्रीम कोर्ट ने 36 रफाल लड़ाकू विमानों की खरीद के मामले में न्‍यायालय की निगरानी में जांच की मांग संबंधी पुनर्विचार याचिकाओं को आज खारिज कर दिया. न्‍यायालय ने कहा कि पुनर्विचार याचिकाएं सुनवाई लायक नहीं है. तीन न्‍यायाधीशों की पीठ ने रफाल सौदे में प्राथमिकी दर्ज करने की मांग भी नामंजूर कर दी. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस के कौल और जस्टिस के एम जोसेफ की पीठ ने फैसला सुनाया.

इन याचिकाओं में 14 दिसम्‍बर 2018 के उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की गई थी जिसमें न्‍यायालय ने कहा था कि रफाल खरीद के निर्णय से संबंधित प्रक्रिया में संदेह का कोई सवाल ही नहीं है.

न्‍यायालय में दायर पुनर्विचार याचिकाओं में पूर्व केन्‍द्रीय मंत्रियों यशवंत सिन्‍हा और अरूण शौरी तथा अधिवक्‍ता प्रशांत भूषण की याचिकाएं भी शामिल थीं. याचिका में आरोप लगाया गया है कि रफाल सौदे से जुड़े महत्‍वपूर्ण तथ्‍यों को दबाया गया है, इसलिए इसकी आपराधिक जांच की जानी चाहिए.