पोस्ट



डॉल्फ़िन के संरक्षण के लिए भारत, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमा में सहमति

नदियों में पाई जाने वाली डॉल्फ़िन के संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए भारत, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमा के विशेषज्ञ मिलकर सहयोग करने पर सहमत हुए हैं. यह सहमति वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से आयोजित एक संगोष्ठी में बनी. इस संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से इस डॉल्फ़िन के संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए भविष्य की रणनीति पर भी चर्चा की.

डॉल्फ़िन एक विशेष प्रजाति है जो मुख्य रूप से एशिया और दक्षिण अमरीका की नदियों में पाई जाती है. यह प्रजाति तेजी से लुप्त हो रही है. भारत के राष्ट्रीय जलीय जंतु गांगेय डॉल्फिन को प्रकृति संरक्षण के अन्तर्राष्ट्रीय संघ द्वारा लुप्तप्राय घोषित किया गया है.

विशेषज्ञों का मानना था कि डॉल्फिन संरक्षण के लिए वैज्ञानिक हस्तक्षेप के साथ सामुदायिक भागीदारी भी जरूरी है. उन्होंने छात्रों को डॉल्फिन के बारे में जानकारी देने और इस बारे में समग्र जागरूकता पर भी चर्चा की.

वैज्ञानिकों ने ओजोन परत के सबसे बड़ा छेद के बंद हो जाने की पुष्टि की

यूरोपियन संघ के कोपर्निकस एटमॉस्फियर मॉनिटरिंग सर्विस (CAMS) के वैज्ञानिकों ने ओजोन लेयर के सबसे बड़ा छेद (Largest Hole on the Ozone Layer) के भर जाने की पुष्टि की है. यह ओजोन लेयर यह छेद उत्तरी ध्रुव (धरती का आर्कटिक वाला क्षेत्र) के ऊपर लगभग 10 लाख वर्ग किमी तक फैला था. यह ओजोन परत के इतिहास में पाया गया सबसे बड़ा छेद था. इस छेद की वजह से धरती पर बड़ा खतरा मंडरा रहा था.

CAMS के वैज्ञानिकों के अनुसार, इस छेद के बंद होने का मुख्य कारण ध्रुवीय भंवर है. ध्रुवीय भंवर चक्रवाती हवाएँ हैं जो ध्रुवीय क्षेत्रों में ठंडी हवाएं लाती हैं. CAMS ने कहा कि, इस साल ध्रुवीय भंवरें बहुत ज्यादा मजबूत हैं और इसके अंदर का तापमान बहुत ठंडा है.

ओजोन लेयर: एक दृष्टि

  • पृथ्वी की सतह से 20 से 30 किलोमीटर की ऊंचाई (समताप मंडल में) पर ओजोन गैस की एक परत पाई जाती है. इसे ही ओजोन लेयर कहा जाता है.
  • ओजोन लेयर सूर्य से आने वाली हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट रेडिएशन (पराबैगनी विकिरणों) को पृथ्वी पर आने से रोकती है. इसीलिए पृथ्वी पर जीवन के लिए ओजोन परत बहुत महत्वपूर्ण है.
  • ओजोन लेयर में छेद का मुख्य कारण क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स और हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन्स होते है. स्ट्रेटोस्फेयर में इनकी मात्रा बढ़ने से ओजोन लेयर नुकसान पहुँचता है.
  • ओज़ोन ऑक्सीजन का ही एक प्रकार है और इसे O3 के संकेत से प्रदर्शित करते हैं. ऑक्सीजन के जब तीन परमाणु आपस में जुड़ते है तो ओज़ोन परत बनाते हैं.
  • ओजोन परत का निर्माण सूर्य से आने वाली अल्ट्रावायलेट रेडिएशन की वजह से होता है. जब यह अल्ट्रावायलेट किरणें सामान्य ऑक्सीजन (O2) के अणुओं पर गिरती हैं तो यह अक्सीजन के दोनों परमाणुओं को अलग-अलग कर देती है. मुक्त हुए यह दोनों ऑक्सीजन परमाणु, ऑक्सीजन के दूसरे अणु से मिलकर ओजोन (O3) का निर्माण करते हैं.

11वां पीटरबर्ग जलवायु संवाद जर्मनी की मेजबानी में आयोजित किया गया

11वां पीटरबर्ग जलवायु संवाद (11th Petersberg Climate Dialogue) 27-28 अप्रैल को विडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित किया गया. इस संवाद की मेजबानी जर्मनी सह-अध्यक्षता यूनाइटेड किंगडम (UK) ने की जिसमें 30 से अधिक देशों ने भाग लिया. केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री प्रकाश जावड़ेकर ने इस संवाद में भारत का प्रतिनिधित्व किया.

पीटरबर्ग जलवायु संवाद: एक दृष्टि

‘पीटर्सबर्ग जलवायु संवाद’ (PCD) को जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल की पहल पर 2010 में शुरू किया गया था. वर्ष 2009 में कोपेनहेगन जलवायु वार्ता के प्रभावी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचने के कारण इसे शुरू किया गया था. PCD का लक्ष्य जलवायु के संबंध में अंतरराष्ट्रीय विचार-विमर्श हेतु एक मंच प्रदान करना है.

NTPC ने पर्यावरण अनुकूल हाइड्रोजन ईंधन आधारित बसों के परिचालन की योजना बनाई

सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली कंपनी NTPC ने हाइड्रोजन ईंधन सेल से चलने वाली 10 इलेक्ट्रिक बसें और 10 कार खरीदने के लिए वैश्विक स्तर पर रुचि पत्र मंगाया है. कंपनी की योजना इन बसों और कारों का परिचालन दिल्ली और लेह के बीच करने की है. नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सहयोग से इस पहल को पायलट परियोजना के आधार पर दिल्ली और लेह में लागू किया जाएगा.

हाइड्रोजन ईंधन आधारित सेल क्या है?

पर्यावरण अनुकूल इन बसों में हाइड्रोजन ईंधन आधारित सेल होता है. इसमें एक ईंधन सेल में से हाइड्रोजन को प्रवाहित किया जाता है. सेल के भीतर हाइड्रोजन इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन में टूट जाता है. वहीं अलग हुए इलेक्ट्रॉन को एक सर्किट में भेजा जाता है, जो विद्युत धारा और ऊष्मा का उत्पादन करता है. यह ईंधन कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद करता है. कंपनी इसके लिए हाइड्रोजन के उत्पादन और भंडारण के साथ-साथ वितरण की भी व्यवस्था करेगी.

भारत में 1 अप्रैल से BS-6 उत्सर्जन मानक लागू, क्या है BS-4 और BS-6 में अंतर

भारत में 1 अप्रैल 2020 से BS-6 (Bharat Stage VI) उत्सर्जन मानक (Emission Norm) लागू हो गया. अभी तक देश में BS-4 (Bharat Stage IV) उत्सर्जन मानक लागू था. सरकार ने BS-5 को छोड़कर सीधे BS-6 उत्सर्जन को लागू करने का निर्णय लिया था. इसे लागू करने का उद्देश्य वाहनों से निकलने वाले प्रदूषक तत्व को कम करना है.

भारत में 2000 उत्सर्जन मानक लागू किया गया था

प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए भारत में चलने वाले वाहनों के लिए उत्सर्जन मानक ‘BS-1’ 2000 में लागू किया गया था. BS-1 (Bharat Stage) को यूरोपियन कार्बन उत्सर्जन मानक ‘euro-1’ की तर्ज पर लागू किया गया था. इसके बाद क्रमशः BS-2, BS-3 और BS-4 को लागू किया गया.

BS-3, BS-4 और BS-6 में अंतर

हर एक उत्सर्जन मानक में पेट्रोल और डीजल गाड़ियों से निकलने वाले धुएं के साथ सल्फर की मात्रा को कम किया जाता है. BS-3 मानक के पेट्रोल गाड़ियां 150 mg/kg (मिलीग्राम प्रति किलोग्राम) सल्फर उत्सर्जित कर सकती थी जो BS-6 में घटकर 10 mg/kg हो गया है. इसी तरह BS-3 मानक के डीजल गाड़ियां 350 mg/kg सल्फर उत्सर्जित कर सकती थी, जिसकी मात्रा BS-6 में 10 mg/kg हो गई है.

सल्फर उत्सर्जन (अधिकतम)

पेट्रोल: BS-3 150 mg/kg, BS-4 50 mg/kg, BS-6 10 mg/kg
डीजल: BS-3 350 mg/kg, BS-4 50 mg/kg, BS-6 10 mg/kg

ईंधन ग्रेड क्या है?

BS के बिभिन्न उत्सर्जन मानकों के तहत वाहन के इंजन को इस हिसाब से डिजाइन किया जाता है कि उससे निकलने वाले धुएं से सल्फर की मात्रा भारत सरकार के तय पैमाने के आधार पर निकले. इसके लिए कम सल्फर वाले ईंधन का भी इस्तेमाल किया जाता है और सरकार की तरफ से ईंधन का ग्रेड तय किया जाता है. BS-6 ईंधन देशभर में 1 अप्रैल 2020 से मिलना शुरू हो गया है.

मार्च का अंतिम शनिवार: 14वां अर्थ ऑवर मनाया गया

ऊर्जा की बचत कर धरती को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष मार्च के अंतिम शनिवार (last Saturday of March) को ‘अर्थ ऑवर’ (Earth Hour) मनाया जाता है. इस वर्ष 28 मार्च 2020 को पूरे विश्व में अर्थ ऑवर मनाया गया. इसमें 187 देशों के सात हजार से ज्यादा शहरों ने हिस्सा लिया. अर्थ आवर का यह 14वां संस्करण था, जो ग्रीन ग्रुप WWF द्वारा आयोजित किया गया था. अर्थ ऑवर 2020 का विषय (थीम) ‘Climate Change’ था.

अर्थ ऑवर क्या है?

अर्थ ऑवर लोगों के लिए जलवायु परिवर्तन पर कार्रवाई करने के लिए दुनिया का सबसे बड़ा जमीनी स्तर का आंदोलन है. इस अवसर पर विश्व भर में लोगों को एक घंटे के लिए गैर-आवश्यक उपकरणों की बिजली बंद करने का आवाहन किया जाता है.

अर्थ ऑवर को वर्ष 2007 में वर्ल्ड वाइड फण्ड फॉर नेचर द्वारा शुरू किया गया था. अर्थ ऑवर के द्वारा पर्यावरण सुरक्षा तथा जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के प्रति प्रतिबद्धता प्रकट की जाती है.

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया गया

केंद्र सरकार ने 2 मार्च को मध्यप्रदेश में राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (eco-sensitive zone- ESZ) घोषित किया. राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में गांगेय डॉल्फिन और अत्यंत लुप्तप्राय घड़ियाल पाए जाते हैं.

पर्यावरण मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार इस अभयारण्य की सीमा से 0 से 2 किलोमीटर के दायरे में आने वाले क्षेत्र को पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील घोषित किया गया है. अधिसूचना में वन्यजीव अभयारण्य के एक किलोमीटर या ESZ तक, जो भी नजदीक हो, किसी भी होटल या रिजॉर्ट के निर्माण पर रोक लगायी है.

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य: एक दृष्टि

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य मध्य प्रदेश के श्योपुर, मुरैना और भिंड जिलों में 435 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है. यह 75 प्रतिशत घड़ियालों का प्राकृतिक आवास है. इस अभयारण्य में ताजा पानी में पायी जाने वाली गांगेय डॉल्फिन, ताजा पानी के कछुओं की नौ प्रजातियां और पक्षियों की 180 से अधिक प्रजातियां भी पायी जाती हैं.

इको-सेंसिटिव जोन क्या हैं?

इको-सेंसिटिव जोन (ESZ) संरक्षित क्षेत्रों, राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास के क्षेत्र हैं. ESZ को भारत सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत अधिसूचित किया जाता है. इसका मूल उद्देश्य राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के आस-पास कुछ गतिविधियों को विनियमित करना है ताकि ऐसी गतिविधियों के नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सके.

एशियाई हाथी, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को संरक्षण हेतु सूचीबद्ध किया था

सरकार ने इससे पहले प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण को लेकर एशियाई हाथी, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड और बंगाल फ्लोरीकन को सूचीबद्ध किया था. इन प्रजातियों के वास स्थलों को सुरक्षित क्षेत्र के रूप में घोषित करने के अलावा भारत में दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियों में शामिल हिम तेंदुआ, ओलिव रिडले कछुए, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, गांगेय डॉल्फिन और डुगोंग आदि को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की पहली अनुसूची में सूचीबद्ध कर इन्हें उच्चतम श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की गई है.

वैज्ञानिकों ने घोंघे की एक नई प्रजाति खोजी, ग्रेटा थनबर्ग का नाम दिया

ब्रुनेई में वैज्ञानिकों ने घोंघे की एक नई प्रजाति की खोज की है. इस प्रजाति का नाम पर्यावरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग के नाम पर ‘क्रास्पेडोट्रोपिस ग्रेटाथनबर्ग’ रखा गया है. यह घेंघा दो मिमी लंबा और एक मिमी चौड़ा है.

घोंघों की यह प्रजाति ‘केनोगैस्ट्रोपॉड्स’ समूह से संबंधित है. जमीन पर रहने वाली इस प्रजाति पर सूखा, तापमान में अत्यधिक उतार-चढ़ाव और जंगलों की कटाई का असर होता है. नई प्रजाति के घोंघे ब्रूनेई के कुआला बेलालॉन्ग फील्ड स्टबडीज सेंटर के करीब पाए गए.

घोंघे का तापमान के प्रति संवेदनशील होने के कारण इसका नाम ग्रेटाथनबर्ग पर गया है. ग्रेटा जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनियाभर में जागरुकता फैलाने का काम कर रही हैं. यह सम्मान इन्हीं प्रयासों को देखते दिया गया है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रेटा थनबर्ग के नाम पर इसका नामकरण करने के पीछे हमारा उद्देश्य यह बताना है कि थनबर्ग की पीढ़ी को उन समस्याओं का समाधान भी ढूंढना होगा, जिन्हें उन्होंने पैदा नहीं किया.

ग्रेटा थनबर्ग: एक दृष्टि

ग्रेटा थनबर्ग जलवायु परिवर्तन के ख़तरों पर केंद्रित एक स्वीडिश पर्यावरण कार्यकर्ता हैं. अगस्त 2018 में, 15 वर्ष की उम्र में, ग्रेटा थनबर्ग ने स्वीडन की संसद के समक्ष पेरिस समझौते के मुताबिक कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए विरोध प्रदर्शन किये जाने के कारण चर्चित हो गयीं थीं. 11 दिसम्बर 2019 को इन्हें ‘टाइम पर्सन ऑफ़ द इयर’ का अवॉर्ड दिया गया था.

संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन (Climate Action Summit) को संबोधित करते हुए थनबर्ग ने विकसित देशों पर अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी न करने का आरोप लगाया था. विश्व नेताओं को भावुकता से संबोधित करते हुए ग्रेटा ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण लोग यातना झेल रहे हैं, मर रहे हैं और पूरी पारिस्थितिकीय प्रणाली ध्वस्त हो रही है.

पलाऊ सन क्रीम के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला देश बना

प्रशांत महासागरीय देश पलाऊ (Pacific nation Palau) सन क्रीम के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला देश बन गया है. पलाऊ में 1 जनवरी 2020 से सन क्रीम पर यह प्रतिबंध उसमें इस्तेमाल होने वाले खतरनाक रसायन के चलते लगाया गया है. पलाऊ ने ऑक्सीबेंजोन और ऑक्टीनोजेट रसायनों से बनी क्रीम पर पाबंदी की घोषणा पहले ही कर दी थी.

पर्यावरण की रक्षा के लिए

सन क्रीम के इस्तेमाल पर प्रतिबंध पर्यावरण को होने वाले नुकसान से बचाने के लिए है. कोरल रीफ से घिरे यह द्वीप विभिन्न प्रकार के जीवों का घर है. इंटरनेशनल कोरल रीफ फाउंडेशन के मुताबिक, सन क्रीम के तौर पर इस्तेमाल होने वाले रसायन समुद्री जीवों के लिए जहर के समान हैं. वन्यजीवों पर खतरनाक असर को देखते हुए अमेरिका के वर्जिन आइलैंड्स और हवाई प्रांत में भी सन क्रीम पर पाबंदी लगाई जा चुकी है.

भारतीय जहाजों में सिंगल यूज प्‍लास्टिक पर प्रतिबंध

महासागरों के परिस्‍थितिकी तंत्र को बचाने के लिए पिछले साल नवंबर में भारत ने भी बड़ा कदम उठाया था. भारत के नौवहन महानिदेशालय (Directorate General of Shipping) ने साल 2020 से भारतीय जहाजों में सिंगल यूज प्‍लास्टिक (single use plastics) और उसके उत्‍पादों पर बैन लगा दिया था.

प्लास्टिक प्रदूषण को लेकर आई इंटरनेशनल मेरीटाइम ऑर्गनाइजेशन (आईएमओ) की रिपोर्ट में कहा गया है कि सागरों और महासागरों में प्‍लास्टिक प्रदूषण यदि इसी तेजी से बढ़ता रहा तो सन 2050 तक महासागरों में प्लास्टिक की मात्रा मछलियों से ज्‍यादा होगी.

दिल्‍ली सरकार ने ‘इलेक्ट्रिक व्‍हीकल पॉलिसी 2019’ को मंजूरी दी

दिल्‍ली सरकार ने 23 दिसम्बर को ‘इलेक्ट्रिक व्‍हीकल नीति’ (Delhi Electric Vehicle Policy) 2019 को मंजूरी दी. राज्य में वायु प्रदूषण को कम करने के उद्देश्य से इस नीति को मंजूरी दी गयी है. इस नीति को लागू करने के लिए एक इलेक्टिक वाहन बोर्ड का गठन किया जाएगा.

इस नीति के तहत सरकार ई-वाहनों को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी देगी. इसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि 2024 तक पंजीकृत होने वाले 25% नए वाहन इलेक्ट्रिक वाहन हों.

ई-वाहन नीति का पहला मसौदा नवंबर 2018 में सार्वजनिक किया गया था. यह नीति संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम, अंतर्राष्ट्रीय परिवहन परिषद, स्वच्छ परिवहन, निकाय जैसे कई विशेषज्ञ निकायों से प्रतिक्रिया प्राप्त करने के बाद बनाई गई है.

मैड्रिड में अन्तर्राष्ट्रीय जलवायु सम्मेलन ‘COP 25’ आयोजित किया गया

स्पेन के मैड्रिड में 2 से 14 दिसम्बर तक संयुक्त राष्ट्र का जलवायु सम्मेलन ‘COP 25’ (UN Climate Change Conference- UNFCCC COP 25) का आयोजन किया गया. यह सम्मेलन चिली में आयोजित किया जाना था लेकिन देश में बढ़ते विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए इसके आयोजन में असमर्थता जताई थी. इस सम्मेलन में लगभग 200 देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया.

दुनिया भर में, तापमान में वृद्धि, जंगलों में आग, बाढ़, सूखा आदि की बढती घटना को मानव निर्मित ग्लोबल वार्मिंग से जोड़ा जा रहा है, जो इस सम्मेलन के वार्ता का मुख्य हिस्सा था. इस जलवायु वार्ता में कार्बन बाजारों के बारे में कोई समझौता नहीं हो पाया.

यह सम्मेलन 2015 के पेरिस समझौते को पूरा करने में असफल रही जिसके कारण संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतेरेस ने इसे ग्लोबल वार्मिंग से लड़ने के लिए एक गंवाया हुआ मौका कहा. दो सप्ताह की इस लंबी वार्ता में प्रमुख मुद्दों जैसे कि अनुच्छेद 6, हानि और क्षति, और दीर्घकालीन वित्तीय सहायता पर कोई समझौता नहीं हो सका.

COP 25 सम्मेलन में दुनिया के करीब दो सौ देशों के प्रतिनिधियों ने सामूहिक घोषणा-पत्र जारी किया. इसमें धरती के बढ़ते तापमान के लिए जिम्‍मेदार ग्रीन हाउस गैसों के उत्‍सर्जन में कटौती तथा जलवायु परिवर्तन से प्रभावित गरीब देशों की मदद की बात कही गई. जलवायु परिवर्तन पर अगली वार्ता (COP 26) ग्‍लासगो में होगी.

COP 25 में वैज्ञानिकों ने भविष्य में ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए शीघ्र बड़े कदम उठाने की आवश्यकता बताई. सम्मेलन में पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन से संबंधित आपदाओं पर चर्चा की गई, जिसमें अप्रत्याशित चक्रवात, अकाल और रिकॉर्ड-तोड़ ‘लू’ शामिल था.

भारतीय जलवायु कार्यकर्ता लिसिप्रिया कांगुजम चर्चा में रही

COP25 जलवायु सम्मेलन में भारत की आठ वर्षीय जलवायु कार्यकर्ता लिसिप्रिया कांगुजम की उपस्थिति चर्चा में रही. उसने दुनिया को भावी पीढ़ियों के प्रति उसके दायित्‍यों को याद दिलाया. सम्मेलन के दौरान कंगुजाम ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव अन्तोनियो गुतरश गुतरेस से मुलाकात की और दुनिया के बच्चों की ओर से एक ज्ञापन प्रस्तुत किया.

संयुक्तराष्ट्र महासचिव का संबोधन

सम्मेलन को संबोधित करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव अन्तोनियो गुतरश गुतरेस ने जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए विश्व में किए जा रहे प्रयास अपर्याप्त बताया. उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन से धरती का तापमान बढने का खतरा काफी बढ़ गया है. महासचिव ने कहा कि धरती का तापमान बढ़ने और मौसम पर इसके तीव्र प्रभाव का असर दुनिया-भर में महसूस किया जा रहा है.

वैज्ञानिकों ने अनुत्क्रमणीय परिवर्तन की चेतावनी जारी की

COP25 सम्मेलन में वैज्ञानिकों ने जलवायु पर कोई कार्रवाई नहीं किये जाने पर ‘अनुत्क्रमणीय परिवर्तन’ की चेतावनी जारी की. “वर्ल्ड साइंटिस्ट्स वार्निंग ऑफ ए क्लाइमेट इमरजेंसी” के सह-लेखक, विलियम मूमाव ने कहा कि वर्तमान वैश्विक प्रतिबद्धताएं जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को रिवर्स करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं.

मोओमा द्वारा सह-लिखित एक अध्ययन जो नवंबर में बायोसाइंस पत्रिका में प्रकाशित हुआ था, जलवायु परिवर्तन के चलते होने वाली ‘अनकही पीड़ा’ की चेतावनी दी थी. इस अध्ययन का समर्थन 11,000 वैज्ञानिकों ने किया था.

भारतीय शिष्टमंडल का नेतृत्व पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने किया

भारत रचनात्‍मक और सकारात्‍मक परिप्रेक्ष्‍य के साथ इस सम्‍मेलन में भाग लिया. सम्मेलन में भारतीय शिष्टमंडल का नेतृत्व वन, पर्यावरण तथा जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने किया. सम्मेलन को संबोधित करते हुए पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने मैड्रिड जलवायु सम्‍मेलन में अपने दीर्घावधि विकास हितों की सुरक्षा पर कम करने की बात कही.

सम्‍मेलन के दौरान मंत्रिस्‍तरीय बैठक के पूर्ण सत्र में पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने और अधिक देशों से अंतरराष्‍ट्रीय सौर गठबंधन में शामिल होने का आह्वान किया है. ऊर्जा की बढ़ती मांग को देखते हुए जीवाश्‍म ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए 2015 में पेरिस में प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी और फ्रांस के तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति फ्रांस्‍वा ओलांद ने अंतरराष्‍ट्रीय सौर गठबंधन का शुभारंभ किया था.

पर्यावरण की रक्षा के लिए भारत द्वारा उठाये गये मुख्य कदम

भारत पिछले चार वर्ष में जलवायु परितर्वन से निपटने के कार्य करने में अग्रणी रहा है. देश के चार सौ पचास गीगावाट के महत्‍वाकांक्षी नवीकरणीय ऊर्जा कार्यक्रम ने पूरी दुनिया का ध्‍यान आकर्षित किया है. यह इस क्षेत्र में विश्‍व का सबसे बड़ा कार्यक्रम है.

भारत विश्‍व के कुछ ऐसे देशों में शामिल है, जहां वन क्षेत्र बढ़ा है. अंतर्राष्‍ट्रीय सौर गठजोड़ और आपदा अनुकूल बुनियादी ढांचे के लिए गठजोड़ का सबसे पहले प्रस्‍ताव कर प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने इस क्षेत्र में महत्‍वपूर्ण योगदान दिया है.
जानिए क्या है UNFCCC-COP और पेरिस समझौता

पानीपत में बायोमास एथेनॉल का संयंत्र लगाने के लिए इंडियन ऑयल कार्पोरेशन लिमिटेड को मंजूरी

सरकार ने हरियाणा के पानीपत में बायोमास एथेनॉल का संयंत्र लगाने की इंडियन ऑयल कार्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) को मंजूरी दी है. केन्द्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने एथनॉल के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिये मंत्रालय ने इस परियोजना को 11 नवम्बर को मंजूरी दी. इसके तहत IOCL को 766 करोड़ रुपये की लागत से दूसरी पीढ़ी के बायोमास आधारित ईंधन (2G एथेनॉल) के संयंत्र को लगाने की मंजूरी दी गयी है.

इस परियोजना से न सिर्फ पर्यावरण हितैषी ईंधन को बढ़ावा मिलेगा बल्कि किसानों की आय को दोगुना करने के सरकार के लक्ष्य को प्राप्त करने में भी मदद मिलेगी.

उल्लेखनीय है कि IOCL ने 100 किलोलीटर प्रतिदिन उत्पादन क्षमता वाले 2G एथेनॉल संयंत्र से पर्यावरण पर पड़ने वाले संभावित असर की आंकलन रिपोर्ट इस साल जून में मंत्रालय के समक्ष पेश करते हुये इसकी स्थापना के लिये मंजूरी का आवेदन किया था.

IOCL इस परियोजना में बायोमास आधारित ईंधन के रूप में एथेनॉल के उत्पादन के लिये धान और अन्य कृषि उत्पादों की पराली का इस्तेमाल किया जायेगा. संयंत्र में 100 किलोलीटर एथेनॉल के उत्पादन के लक्ष्य की प्राप्ति के लिये प्रतिदिन 473 टन पराली की आवश्यकता होगी.

क्या है एथेनॉल?

  • एथेनॉल एक तरह का अल्कोहल है जिसे पेट्रोल में मिलाकर गाडिय़ों में इंधन के रूप इस्तेमाल किया जा सकता है. इसका उत्पादन मुख्य रूप से गन्ने की फसल से होता है लेकिन कई अन्य फसलों से भी इसे तैयार किया जा सकता है.
  • एथेनॉल इंधन के इस्तेमाल से कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) का उत्सर्जन 35 फीसदी तक कम हो जाता है. यह सल्फर डाइऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन और नाइट्रोजन ऑक्साइड के उत्सर्जन को भी कम करता है. इसमें 35 फीसदी फीसद ऑक्सीजन होता है.
  • एथेनॉल इंधन का सर्वाधिक इस्तेमाल ब्राजील में किया जाता है. यहाँ 40 फीसद गाडिय़ां पूरी तरह से एथेनॉल पर निर्भर हैं. बाकी गाडिय़ां भी 24 फीसदी एथेनॉल मिला ईंधन उपयोग हो रहा है.